Thursday, May 03, 2007

मैं और मेरी तनहाई .......

So here is the poem i have promised to bring on......i have written it in quite a hurry and have'nt got time to modify this so if it is not good enough plzz let me know.......may be i can rectify myself in near future................title of this poem is "Wo Beete Din"....and its kinda a way to express my feelings as i m gonna leave this place in few days.......
वो बीते दिन याद आने लगे हैं
रह रह के हमको रुलाने लगे हैं

सोचा था जिन यादों को छोड़ आये हम कहीँ
वो अगले ही मोड़ पे नज़र आने लगे हैं

अब याद आता है वो गुजरा ज़माना

वो उसका सुनना वो मेरा सुनाना
कभी बिन सुने ही ठहाके लगाना
बरबस ही हमको हँसाने लगे हैं

वो रातों को जगना वो बाहर निकलना

वो बाहर निकल के किधर को भी जाना
वो रातें वो बातें वो यादें वो सारी

पहलू में हमको बुलाने लगी हैं

उनींदी उन आंखों के सपने वो सारे

संजोये थे जो हमने बडे ही जतन से
अब टूटे उन सपनों कि यादें
रातों की नींदे उड़ाने लगे हैं

जिन आँखों में सदियों से आये थे न आंसू
जो रोने का हमसे सबब पूंछती थी
वही आज क्यों इतनी ग़मगीन होकर
फुरसत में हमको रुलाने लगी हैं

सोचा था इन यादों को सजा के अपनी आंखों में
हो जायेंगे बेखबर सारी दुनिया की बातों से
अब बोझिल पलकें लिए रात भर जागते हम
वो रातों की नींदों को भूल जाने लगे हैं

जिन होंठों पे सदा रहती थी मुस्कराहट
रंजो गम का जिनको पता भी नही था
वही आज क्यों इतने चुपचाप से हैं
मानो वो हँसना भूल जाने लगे हैं

क्यों आज पुरानी यादों कि जब हमने एक तस्वीर बनायीं
कुछ न हमको नज़र आया बस याद तुम्हारी ही आयी
क्यों अपनी ही यादों में अजनबी से बन गए हम
अब यादें भी हमको भूल जाने लगी हैं

हवाओं में इतनी नमी आज क्यों है
क्यो इनका भी रुख अब हमारी तरफ है
क्या इनको भी इस बात कि है खबर
कि दिन रुखसत के नजदीक आने लगे हैं

कदम आज क्यों उठ के बढते नही हैं
हम अपने ही क़दमों से हार जाने लगे हैं
वो बीते दिन ..........
And life goes on in search of something better.......
Copyright © 2001 – 2007 Rahul Tripathi, All rights reserved.
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