Friday, February 06, 2009

आज का यथार्थ.....

This poem which I am writing below is my favorite poem.....

ह्रदय छोड़ भाव गए ,प्यार और चाव गए
अब नही लगाव है , आभाव शेष रह गए
नियम रीति नीति के विधान जल गए सभी
कार्य सिद्धि के लिए दबाव शेष रह गए
आभाव शेष रह गए........

क्या पता भविष्य का हविष्य कौन कौन है
छल कपट निधान ही महान हो प्रमाण हो
नेह की नदी तभी बह चुकी यहाँ कभी
बचना लिए हुए कटाव शेष रह गए
आभाव शेष रह गए........

स्वदेश को सुदेश हम कहाँ अभी बना सके
चरित्र, सत्य, न्याय भी न न्याय यहाँ पा सके
आँख आँख है सजल होंठ पर नहीं ग़ज़ल

स्वतंत्रता के नाम पर चुनाव शेष रह गए
आभाव शेष रह गए........

मातृ ,पितृ, भक्ति को है मुक्ति मिल चुकी तभी
सुबंध भाव यज्ञ को कबंध ने दला कभी
पूज्य भाव धारणा बन चुकी प्रतारणा
दान, मान, नाम पर कलाव शेष रह गए

आभाव शेष रह गए........

भ्रष्ट आचरण ही जहाँ मंगलाचरण बना
न्याय, देशभक्ति की वहां कहां विचारना
सत्य, नीति के वसन असत्य ने पहन लिए
हम हमीं नहीं रहे छिपाव शेष रह गए
आभाव शेष रह गए........

अर्थतंत्र , यन्त्र ने विदीर्ण की मनुष्यता
कुशाग्र कर रहे कुबेर, धाम नीच दासता
त्याज्य क्या वरेण्य क्या, छोड़ कर विवेक को
क्षणिकलाभ के लिए खिंचाव शेष रह गए
आभाव शेष रह गए........

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